गली के चौराहे पर एक महफिल सज रही थी…
गर्म आँच पर अदरक वाली चाय उबल रही थी…
लबों पर गरमाहट और दिल को राहत पहुँचा रही थी…
वो गर्म चाय आते जाते लोगों को अपने करीब बुला रही थी…
अनजान लोगों को एक मुक़ाम पर जानकार बना रही थी…
वो चाय की टपरी हम दोस्तों का रोज का अड्डा बनते जा रही थी…
पत्ती से कड़वे और शक्कर से मीठे सारे सूख दुख बाहर ला रही थी…
वो गर्म कुल्हड़ की खुशबू उस शाम में एक समा सा बांधते जा रही थी…!!
:-प्रथमेष 🖋
बहुत सही लिखा है दोस्त!!
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Thank you❤
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चाय और दोस्तों की याद दिला दी यार… ❣️
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Nostalgic and beautiful 😍☺️
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Again, you wrote so well prathmesh ❤️
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So relatable, very nicely written 😊
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