जब गिरी बूँद छत से, तो आशियाने भीग गए…
थका जब सफर ए ज़िंदगी में, मेरी नाकामयाबी के इश्तिहार छप गए…
जब की रोशन एक चिंगारी खुदमें, हज़ारों तूफान उसे फूँकने आ गए…
हुआ खामोश मैं कुछ पल के लिए, मेरी चुप्पी के जनाज़े निकल गए…
और फिर जब गिरी बूँद आँखों से, सारे जज़्बात खारे पड़ गए…
अंत में जब किया मैने पलट कर प्रतिशोध, तो सारे इतिहास बदल गए…!!
:- प्रथमेष 🖋