🌚

कितनी काली होती हैं ये उजली रातें…पूछ जाकर उनसे जिनके घर पर छत नहीं होती… सुबह का सवेरा तू क्या देखेगा…तेरी तो उनकी तरह धूप से रूबरू बात भी नहीं होती…!! :-प्रथमेष 🖋

…!!

मैं बोलता नहीं सिर्फ़ शब्द लिखता हूँ…मिठास से थोड़ा इसीलिए फासला सा रखता हूँ… कि कहीं ज़िंदगी मिठाई की तरह दाढ़ में चिपक न जाए…कड़वी ही सही, कोई दवा समझकर निगल ही जाए…!! :-प्रथमेष 🖋

Create your website with WordPress.com
Get started